सोमवार, 15 जून 2015

आगे बढ़ो...




एक दिन 
मैंने ही तुमसे कहा था 
आगे बढ़ो 
क्यों ठहरे हुए हो तुम 
क्यों रुक गए हो मुझ पे...
कह तो दिया था तुमसे 
अतीत कभी पलट कर नहीं आता 
गुज़रा वक़्त कभी खुद को नहीं दोहराता 
मैं बीता कल हूँ तुम्हारा 
वो कल 
जो लौट के नहीं आ सकता 
वो कल 
जो आज नहीं बन सकता है 
फिर भी दिल चाहता है 
सबकुछ भूलकर लौट आऊं 
छटपटाती तो हूँ 
सारे बंधन तोड़ के 
तुझ में सिमट जाऊं 
लेकिन 
मुझे मेरे ही शब्द रोक लेते हैं 
मैं ठहर जाती हूँ उस लम्हें में 
जब कहा था तुमसे 
आगे बढ़ो तुम 
मेरा कहा ही तो 
माना है तुमने 
मेरे लिए ही तो 
मुझे छोड़ के 
आगे बढ़ गए हो तुम 

रविवार, 3 मई 2015

पवित्र बंधन



चाहे 
शादी बन जाए
ज़िंदगीभर का नासूर
चाहे 
विवाह में टूट जाएं 
सारी मर्यादाएं
चाहे 
रोज़ रौंदे जाएं 
पत्नी के जज़्बात
चाहे 
दिन रात होता हो
उसका अपमान
चाहे 
वो मर-मर कर 
जीती हो
चाहे 
वो जूते-लात घूंसे 
खाती हो
चाहे वो
जानवरों की तरह
पीटी जाती हो
चाहे 
उसे बिस्तर पर रोज़
हवस का शिकार बनाया जाए
चाहे 
उसे मुर्दा लाश 
समझा जाए
कुछ फर्क नहीं पड़ता
हमारे सभ्य समाज को 
क्योंकि
विवाह तो पवित्र है बंधन
इसीलिए 
पति कर सकता है 
उसका शोषण
उसके साथ जबरन संबंध
बना सकता है
सारी पवित्रताएं ध्वस्त 
कर सकता है
विवाह एक पवित्र बंधन है
इसलिए पति को
बलात्कार का अधिकार है...

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

शब्द नहीं मिलते...



ना जाने
कितनी बार ऐसा हुआ
कि मैं लिखते-लिखते रह गई
तुम्हारे-मेरे बारे में
एहससात से भरा हुआ रिश्ता
ज़ज़्बातों से लबलेज़ हम तुम
फिर क्यों
बयां नहीं कर पाती
कुछ भी हमारे बारे में
कैसे मिले थे हम-तुम
कहां हुई थी पहली मुलाकात
क्या कहा था तुमने मुझसे पहली बार
वो हर इक बात
जो तुमसे-मुझसे जुड़ी थी
वो तुम्हारा दिया तोहफ़ा
वो खुशी का लम्हा
वो गिले वो शिकवे
वो नाराज़गी
वो आंसू
वो सदियों की जुदाई
कुछ भी नहीं लिख पाती
बयां नहीं कर पाती कुछ भी
लफ्ज़ हमेशा से कम थे
हमारे दरमियां
कहां बोले कभी
खुल के एक दूसरे से
शब्द तो आज भी नहीं
मेरे पास
तभी तो
ना जाने
कितनी बार ऐसा हुआ
कि मैं लिखते-लिखते रह गई
तुम्हारे-मेरे बारे में