रविवार, 3 मई 2015

पवित्र बंधन



चाहे 
शादी बन जाए
ज़िंदगीभर का नासूर
चाहे 
विवाह में टूट जाएं 
सारी मर्यादाएं
चाहे 
रोज़ रौंदे जाएं 
पत्नी के जज़्बात
चाहे 
दिन रात होता हो
उसका अपमान
चाहे 
वो मर-मर कर 
जीती हो
चाहे 
वो जूते-लात घूंसे 
खाती हो
चाहे वो
जानवरों की तरह
पीटी जाती हो
चाहे 
उसे बिस्तर पर रोज़
हवस का शिकार बनाया जाए
चाहे 
उसे मुर्दा लाश 
समझा जाए
कुछ फर्क नहीं पड़ता
हमारे सभ्य समाज को 
क्योंकि
विवाह तो पवित्र है बंधन
इसीलिए 
पति कर सकता है 
उसका शोषण
उसके साथ जबरन संबंध
बना सकता है
सारी पवित्रताएं ध्वस्त 
कर सकता है
विवाह एक पवित्र बंधन है
इसलिए पति को
बलात्कार का अधिकार है...

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

शब्द नहीं मिलते...



ना जाने
कितनी बार ऐसा हुआ
कि मैं लिखते-लिखते रह गई
तुम्हारे-मेरे बारे में
एहससात से भरा हुआ रिश्ता
ज़ज़्बातों से लबलेज़ हम तुम
फिर क्यों
बयां नहीं कर पाती
कुछ भी हमारे बारे में
कैसे मिले थे हम-तुम
कहां हुई थी पहली मुलाकात
क्या कहा था तुमने मुझसे पहली बार
वो हर इक बात
जो तुमसे-मुझसे जुड़ी थी
वो तुम्हारा दिया तोहफ़ा
वो खुशी का लम्हा
वो गिले वो शिकवे
वो नाराज़गी
वो आंसू
वो सदियों की जुदाई
कुछ भी नहीं लिख पाती
बयां नहीं कर पाती कुछ भी
लफ्ज़ हमेशा से कम थे
हमारे दरमियां
कहां बोले कभी
खुल के एक दूसरे से
शब्द तो आज भी नहीं
मेरे पास
तभी तो
ना जाने
कितनी बार ऐसा हुआ
कि मैं लिखते-लिखते रह गई
तुम्हारे-मेरे बारे में



मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

अपने हिस्से का चाँद...



अपने हिस्से का चाँद
तुम्हारे शहर भेजा है
वो चाँद जो हमारे
इश्क़ का गवाह है
वो चाँद ...

जिससे रौशन थी हमारी दुनिया
वो चाँद
जो हमारी खुशियों का
साझेदार है
वो चाँद
जो हमारी ज़िन्दगी का
राज़दार है
वो चाँद
जो ख़फ़ा था
हमारे झगड़े पे
वो चाँद
जो उदास था
हमारे आंसुओं के संग
वो चाँद
जो ग्रहण में खो गया था
हमारे जुदा होने पे
अपने अपने हिस्से का चाँद
ले आये थे हम
वही अधूरा चाँद भेजा है
तुम्हारे शहर
शायद ये चाँद ले आये
तुम्हारी कोई ख़बर
हम दोनों का चाँद बन जाए
खुशियों का सबब....