शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

आज एक ख्वाब हो तुम...

आज एक
ख्वाब हो गए
कल तुम
सच थे मेरा...
मैंने तो कभी
नहीं माँगा था
साथ तुम्हारा
तुमने ही
हाथ बढाया...
क्यों आये
मेरे करीब
नहीं समझ पाई...
खुश तो
अब भी हूँ
बस इक सवाल
का जवाब नहीं
तलाश पा रही
तुम क्यों
बन गए पहेली
जिसे मैं सुलझा नहीं पा रही
तुम क्यों
चले गए
बिना कुछ कहे...
परेशान नहीं
बस इक बार
आ जाओ
कह दो मुझसे
की तुम इक ख़वाब थे
तब भी जब
मैं हकीकत मान बैठी थी तुम्हें....

3 टिप्‍पणियां:

मिश्रा राहुल ने कहा…

निदा जी...
काफी उम्दा रचना....बधाई...
नयी रचना
"ज़िंदगी का नज़रिया"
आभार

मिश्रा राहुल ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (29-12-2013) को "शक़ ना करो....रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1476" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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नव वर्ष की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

सादर...!!

- ई॰ राहुल मिश्रा

संजय भास्‍कर ने कहा…

प्रेममय सुंदर भावों की अभिव्यक्ति !!